हम भारतीयों की एक खास आदत है देश की हर समस्या का जिम्मेदार हमें पता है।
सरकार।
सड़क टूटी है—सरकार जिम्मेदार।
नाली जाम है—सरकार जिम्मेदार।
शहर गंदा है—नगर निगम जिम्मेदार।
भ्रष्टाचार है—नेता जिम्मेदार।
बेरोजगारी है—व्यवस्था जिम्मेदार।
और यह सब काफी हद तक सच भी है। आखिर सरकारें और संस्थाएँ बनी ही इसलिए हैं कि व्यवस्था संभालें। लेकिन कहानी में एक छोटा-सा किरदार और भी है, जिसका नाम हम अक्सर लेना भूल जाते हैं
हम खुद।
जिस सड़क की गंदगी देखकर हम सरकार को कोसते हैं, कई बार उसी सड़क पर कार का शीशा खोलकर चिप्स का पैकेट भी फेंक देते हैं। जिस ट्रैफिक व्यवस्था को हम बेकार बताते हैं, लाल बत्ती पर रास्ता खाली दिखते ही सबसे पहले निकलने की कोशिश भी हम ही करते हैं।
हमें देश जापान जैसा चाहिए, सुविधाएँ यूरोप जैसी चाहिए, कानून अमेरिका जैसा चाहिए और सफाई सिंगापुर जैसी चाहिए…
बस नागरिक जिम्मेदारी की बात आते ही हम कहते हैं
"इसके लिए सरकार क्या कर रही है?"
यहीं से शायद हमारी समस्या शुरू होती है।
अधिकार हमें याद हैं, कर्तव्य थोड़ा धुंधले पड़ गए हैं
हम लोकतंत्र में रहते हैं और अपने अधिकारों को जानना बेहद जरूरी है। सरकार से सवाल पूछना भी जरूरी है। लेकिन लोकतंत्र केवल सरकार की जिम्मेदारियों की किताब नहीं है, उसमें नागरिकों के लिए भी कुछ पन्ने लिखे गए हैं।
हमें साफ सड़क चाहिए, लेकिन कचरा डस्टबिन तक ले जाना मुश्किल लगता है।
हमें ट्रैफिक जाम नहीं चाहिए, लेकिन गलत दिशा से निकलकर दो मिनट बचाने हैं।
हमें भ्रष्टाचार खत्म चाहिए, लेकिन अपना काम लाइन से पहले हो जाए तो "कुछ ले-देकर" रास्ता निकालने में कोई खास परेशानी नहीं होती।
हमें ईमानदार नेता चाहिए, लेकिन चुनाव आते ही जाति, धर्म, पहचान और निजी फायदे का गणित शुरू हो जाता है।
फिर पाँच साल बाद हम गंभीर मुद्रा में बैठकर कहते हैं
"इस देश का कुछ नहीं हो सकता।"
देश आखिर है कौन?
हमसे अलग कोई चीज तो नहीं।
विदेश की व्यवस्था अच्छी है, लेकिन उसके पीछे नागरिक भी हैं
हम अक्सर जापान, अमेरिका और यूरोप की तस्वीरें देखकर कहते हैं
"देखो, कितनी सफाई है।"
लेकिन हम यह कम पूछते हैं कि वहाँ सड़कें साफ रहती कैसे हैं?
हर दस कदम पर कोई सरकारी कर्मचारी किसी नागरिक के पीछे झाड़ू लेकर नहीं घूम रहा होता। वहाँ व्यवस्था के साथ नागरिक व्यवहार भी काम करता है।
जापान में बच्चों को छोटी उम्र से सार्वजनिक जिम्मेदारी सिखाई जाती है। कई जगह बच्चे अपने स्कूल की सफाई में स्वयं भाग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि जापान में कोई समस्या नहीं है या हर नागरिक आदर्श है। कोई भी समाज पूर्ण नहीं होता।
लेकिन एक बुनियादी सोच जरूर विकसित होती है
जो सार्वजनिक है, वह किसी का नहीं नहीं है; वह हम सबका है।
हमारे यहाँ अक्सर उलटी मानसिकता दिखाई देती है।
घर के अंदर एक कागज गिर जाए तो तुरंत उठा लेंगे। घर के गेट से दो कदम बाहर वही कागज गिर जाए तो वह नगर निगम की समस्या हो जाता है।
हमने अपनी जिम्मेदारी की सीमा शायद अपने घर की चारदीवारी तक तय कर रखी है।
हमें 'मेक इन इंडिया' चाहिए, लेकिन सामान सस्ता भी चाहिए
हम बड़े गर्व से कहते हैं
"चीनी सामान का बहिष्कार करो।"
फिर ऑनलाइन शॉपिंग करते समय ₹499 का भारतीय उत्पाद और ₹299 का विदेशी उत्पाद दिखाई देता है।
देशभक्ति कुछ सेकंड संघर्ष करती है।
फिर जेब जीत जाती है।
और सच कहें तो इसमें आम आदमी को पूरी तरह दोष देना भी उचित नहीं है। जिस व्यक्ति की आय सीमित है, उसके लिए हर खरीदारी भावनाओं से नहीं चल सकती। वह कीमत देखेगा, गुणवत्ता देखेगा और अपनी जरूरत देखेगा।
इसलिए केवल यह कहना आसान है कि विदेशी सामान मत खरीदो।
असल चुनौती है
भारत में ऐसा सामान बनाओ जिसे खरीदने के लिए लोगों को देशभक्ति की याद दिलानी ही न पड़े।
जब भारतीय उत्पाद गुणवत्ता में बेहतर, कीमत में प्रतिस्पर्धी और आसानी से उपलब्ध होंगे, तो ग्राहक स्वयं उन्हें चुनेगा।
राष्ट्रवाद भाषण से ज्यादा मजबूत तब होता है, जब वह आर्थिक क्षमता में दिखाई देता है।
सरकारी नौकरी नौकरी कम, जीवन का अंतिम लक्ष्य ज्यादा
हमारे देश में सरकारी नौकरी का आकर्षण इतना गहरा है कि कई युवा अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण पाँच-दस साल केवल एक परीक्षा के इंतजार में निकाल देते हैं।
कुछ हजार पद निकलते हैं और लाखों आवेदन पहुँच जाते हैं।
क्लर्क की नौकरी के लिए इंजीनियर आवेदन कर रहा है। छोटे पदों के लिए पोस्टग्रेजुएट और पीएचडी धारक लाइन में हैं।
यह केवल बेरोजगारी की कहानी नहीं है।
यह हमारे समाज की असुरक्षा की कहानी भी है।
प्राइवेट नौकरी कब चली जाए, पता नहीं। छोटे व्यवसाय को समाज अक्सर सम्मान से नहीं देखता। असफल स्टार्टअप करने वाला "नाकाम" माना जाता है, लेकिन दस साल सरकारी परीक्षा देते रहने वाले को कहा जाता है
"तैयारी कर रहा है।"
हमारे समाज ने कोशिशों को भी अलग-अलग सम्मान दे रखा है।
सरकारी नौकरी गलत नहीं है। लेकिन किसी पूरे देश की युवा पीढ़ी का सपना केवल सरकारी नौकरी हो जाए, तो अर्थव्यवस्था कैसे आगे बढ़ेगी?
हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जो नौकरी के फॉर्म भरना ही न सिखाए, बल्कि कुछ बनाना, बेचना, सोचना, जोखिम समझना और समस्याओं का समाधान करना भी सिखाए।
जनसंख्या केवल संख्या नहीं, उसकी गुणवत्ता भी मायने रखती है
हम अक्सर गर्व से कहते हैं कि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में है।
यह निश्चित रूप से एक बड़ी ताकत हो सकती है।
लेकिन केवल युवा होना पर्याप्त नहीं है।
अगर करोड़ों युवाओं के पास अच्छी शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर नहीं होंगे, तो यही युवा आबादी अवसर के बजाय दबाव बन सकती है।
एक नौकरी के पीछे लाखों लोग।
एक सरकारी अस्पताल में हजारों मरीज।
एक अच्छी यूनिवर्सिटी की कुछ सीटों के लिए लाखों उम्मीदवार।
फिर हम कहते हैं कि प्रतियोगिता बहुत बढ़ गई है।
प्रतियोगिता अचानक आसमान से नहीं गिरी। वह जनसंख्या, सीमित संसाधनों और अवसरों की कमी का परिणाम है।
इस विषय पर बात करना असहज हो सकता है, लेकिन किसी समस्या पर चुप रहने से वह समाप्त नहीं होती।
कानून हमारे यहाँ कमजोर नहीं, कई बार उसका डर कमजोर है
भारत में लगभग हर समस्या के लिए कोई न कोई कानून मौजूद है।
सवाल यह है कि कानून लागू कितना होता है।
अगर किसी व्यक्ति को पता है कि गलत पार्किंग करने पर शायद कुछ नहीं होगा, वह करेगा।
अगर पता है कि सड़क पर कचरा फेंकने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी, वह फेंकेगा।
अगर पता है कि नियम तोड़ने के बाद "जान-पहचान" काम आ सकती है, तो कानून केवल किताब में मजबूत रह जाता है।
हमें केवल कठोर कानून नहीं चाहिए।
हमें निश्चित कानून चाहिए।
यानी गलत किया तो कार्रवाई होगी चाहे व्यक्ति गरीब हो, अमीर हो, नेता हो या अधिकारी।
कानून का सबसे बड़ा डर उसकी कठोरता से नहीं, उसकी निश्चितता से पैदा होता है।
वोट देते समय हम नागरिक कम और समूह ज्यादा बन जाते हैं
पाँच साल हम कहते हैं
रोजगार कहाँ है?
अस्पताल कैसे हैं?
स्कूल क्यों खराब हैं?
सड़क क्यों टूटी है?
फिर चुनाव आता है।
और अचानक मुद्दे बदल जाते हैं।
हमारी जाति का कौन है?
हमारे धर्म की बात कौन कर रहा है?
हमें क्या मुफ्त मिलेगा?
हमारे समूह को क्या फायदा होगा?
फिर चुनाव खत्म।
और हम दोबारा पूछते हैं
"विकास क्यों नहीं हुआ?"
लोकतंत्र में नेता आसमान से नहीं उतरते। वे समाज की प्राथमिकताओं को देखकर अपनी राजनीति बनाते हैं।
जिस दिन जनता पूछना शुरू करेगी
मेरे जिले में कितने रोजगार पैदा हुए?
सरकारी स्कूलों की स्थिति क्या हुई?
अस्पताल बेहतर हुए या नहीं?
अपराध कम हुआ या नहीं?
मेरे टैक्स का पैसा कहाँ खर्च हुआ?
उस दिन नेताओं को भी अपने भाषण बदलने पड़ेंगे।
क्योंकि लोकतंत्र में नेता वही बेचते हैं, जिसकी जनता में मांग होती है।
अंधविश्वास और आधुनिक भारत का अजीब मेल
हम चाँद पर अंतरिक्षयान भेज सकते हैं।
हम दुनिया की बड़ी डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकते हैं।
हम मोबाइल से करोड़ों रुपये का कारोबार कर सकते हैं।
लेकिन उसी मोबाइल पर आए एक मैसेज को बिना सोचे दस लोगों को भेज देते हैं क्योंकि लिखा होता है
"इसे आगे नहीं भेजा तो दुर्भाग्य आएगा।"
यही हमारे समाज का एक अजीब विरोधाभास है।
तकनीक आधुनिक हो गई, लेकिन सोच हर जगह उतनी तेजी से आधुनिक नहीं हुई।
परंपरा और संस्कृति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन सवाल पूछना संस्कृति का अपमान नहीं है।
जिस समाज में सवाल पूछना बंद हो जाता है, वहाँ अंधविश्वास आसानी से अपनी जगह बना लेता है।
तो क्या सारी जिम्मेदारी आम आदमी की है?
बिल्कुल नहीं।
यह कहना भी उतना ही गलत होगा कि नागरिक सुधर जाएँ तो सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं।
अगर सड़क ही नहीं बनाई गई तो नागरिक हवा में नहीं चल सकता।
अगर कचरा उठाने की व्यवस्था नहीं है तो केवल भाषण देकर शहर साफ नहीं होगा।
अगर पुलिस निष्पक्ष नहीं है, अदालतों में न्याय मिलने में दशकों लगते हैं और रोजगार के अवसर पर्याप्त नहीं हैं, तो केवल जनता को अनुशासन का पाठ पढ़ाना समस्या का समाधान नहीं है।
इसलिए भारत का बदलाव केवल नीचे से या केवल ऊपर से नहीं आएगा।
दोनों तरफ से आना होगा।
सरकार को बेहतर व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर, निष्पक्ष कानून और जवाबदेह संस्थाएँ देनी होंगी।
और नागरिकों को यह समझना होगा कि देश कोई होटल नहीं है, जहाँ हमने टैक्स दिया और अब सारी जिम्मेदारी मैनेजर की है।
यह हमारा घर है।
और घर में अधिकार भी होते हैं, जिम्मेदारियाँ भी।
आखिर भारत कैसे बदलेगा?
शायद किसी एक चुनाव से नहीं।
किसी एक प्रधानमंत्री से नहीं।
किसी एक कानून से नहीं।
और किसी एक क्रांति से भी नहीं।
भारत उस दिन बदलना शुरू होगा जब एक व्यक्ति सड़क पर कचरा फेंकने से पहले सोचेगा।
जब कोई पिता अपने बच्चे को केवल डॉक्टर और इंजीनियर बनने की शिक्षा नहीं, जिम्मेदार नागरिक बनने की शिक्षा भी देगा।
जब कोई युवा सरकारी नौकरी न मिलने को जीवन का अंत नहीं मानेगा।
जब कोई दुकानदार टैक्स चोरी को अपनी चतुराई नहीं समझेगा।
जब कोई अधिकारी रिश्वत लेने को नौकरी का अतिरिक्त लाभ नहीं समझेगा।
जब कोई नेता यह महसूस करेगा कि जनता अब भाषण से ज्यादा हिसाब मांगती है।
और जब हम किसी समस्या को देखकर केवल यह नहीं पूछेंगे
"सरकार क्या कर रही है?"
बल्कि कभी-कभी खुद से भी पूछेंगे
"मैं क्या कर रहा हूँ?"
भारत को महान बनाने के लिए केवल बड़ी अर्थव्यवस्था, एक्सप्रेसवे, बुलेट ट्रेन और ऊँची इमारतें पर्याप्त नहीं हैं।
किसी देश की असली तरक्की उसकी इमारतों की ऊँचाई से नहीं, उसके नागरिकों की सोच की ऊँचाई से तय होती है।
सरकारें देश का ढाँचा बना सकती हैं।
कानून व्यवस्था बना सकते हैं।
तकनीक देश को आधुनिक बना सकती है।
लेकिन एक सभ्य और मजबूत राष्ट्र का निर्माण अंततः उसके नागरिकों के चरित्र से होता है।
और शायद हमारी सबसे बड़ी भूल यही है कि हम हमेशा किसी ऐसे व्यक्ति का इंतजार करते रहते हैं जो आएगा और देश बदल देगा।
जबकि सच्चाई शायद इससे कहीं साधारण है
देश बदलने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं आएगा।
देश तब बदलेगा, जब करोड़ों लोग अपनी-अपनी छोटी-सी जगह पर थोड़ा-सा बदलना शुरू करेंगे।

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