“परदेशी” यह कोई शब्द नही, भार है जो आजकल हम जैसे ना जाने दुनिया में कितने लोग अपने कंधो पर लिए घूम रहे हैं
माँ बाप जिहोंने हमें पाला, आज हम उनके लिए मेहमान हो गए
बचपन की वो गलियां जंहा हम खेले, उनमे आज हम खो गए
भाई दोस्त जिनके साथ हम खेले, आँखे उनको देखने के लिए तरस गयीं
खुले आगन में पड़ी चारपाई, आज 8x8 के कमरे में सिमट गयी
सच में “यार वो गाँव” “वो बचपन” बहुत याद आता जंहा हम मेहमान की तरह नही अपनों की तरह रहा करते थे 💔😢😢

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